बंद दरवाज़े

कुछ दरवाज़े ऐसे होते हैं जो न कभी खुलते हैं , न कभी बंद होते हैं |
रह जाती है तो बस कुछ खुली खिड़कियां, जो कभी ठंडी हवाएं, कभी खुश्बू साथ ले आती हैं |

मन तो बड़ा करता है दरवाज़े के इस ओर बैठी, ख्वाब बुनती रहूँ, यादों में जीती रहूँ,
फिर थक जाती हूँ, दरवाज़ा तो बंद है, हमेशा बंद ही था |

फिर यह भारी सा क्या महसूस होता है अक्सर, जैसे मुझ में कुछ समा गया हो
और कभी एक अजीब खालीपन, जैसे अंदर से कुछ खो गया हो…

अब दरवाज़े से मुँह मोड़ कर बैठती हूँ,
ऐसा लगता है रूह कहीं बाहर फिर रही है |

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